मुक्तक 



पुण्य कर्मो का स्यंदन रुका न रहे।

कोई पीड़ा दबी, दिल दुखा न रहे ।

सर  पे  हो  ताज  मेरे  तमन्ना  नहीं,

सांस जब भी रुके, सर झुका न रहे ।


कुलदीप 'कलश'

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